Monday, October 21, 2013

आँखों में यहीं सुलगते, सवाल खड़े हैं |
कुछ लोग हीं क्यों देश में , खुशहाल खड़े हैं ?
पैंसठ बरस के बाद भी, इन्साफ के लिए
क्यों आम लोग हीं यहाँ, फटेहाल खड़े हैं ?
कौड़ी का आदमी था ,संसद गया जबसे ,
सुना शहर में उसके, कई माँल खड़े हैं |
किस भाँति देश बेचना, तरकीब सोचते ,
पग-पग पे यहाँ देखिये, दलाल खड़े हैं |

Tuesday, October 15, 2013

रास्ते कहा खत्म होते है ,जिन्दगी के इस सफ़र मे ।
म़न्जिल तो वही है , जहा ख्वाहिशे थम जाय ॥
 
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Friday, October 4, 2013


 

जहां उड़ता फिरे मन बेखौफ और सर हो शान से उठा हुआ जहां इल्म हो सबके लिए बेरोक बिना शर्त रखा हुआ जहां घर की चौखट से छोटी सरहदों में ना बंटा हो जहान जहां सच से सराबोर हो हर बयान जहां बाजुएं बिना थके लगी रहें कुछ मुक्कमल तलाशें जहां सही सोच को धुंधला ना पाएं उदास मुर्दा रवायतें जहां दिलो-दिमाग तलाशे नया खयाल और उन्हें अंजाम दे ऐसी आजादी की जन्नत में आए खुदा मेरे वतन की हो नई सुबह....|

                            एक प्रार्थना गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा