जहां
उड़ता फिरे मन बेखौफ और सर हो शान से उठा हुआ जहां इल्म हो सबके लिए बेरोक
बिना शर्त रखा हुआ जहां घर की चौखट से छोटी सरहदों में ना बंटा हो जहान
जहां सच से सराबोर हो हर बयान जहां बाजुएं बिना थके लगी रहें कुछ मुक्कमल
तलाशें जहां सही सोच को धुंधला ना पाएं उदास मुर्दा रवायतें जहां
दिलो-दिमाग तलाशे नया खयाल और उन्हें अंजाम दे ऐसी आजादी की जन्नत में आए
खुदा मेरे वतन की हो नई सुबह....|
एक प्रार्थना गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर
द्वारा
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